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आज़ाद हिन्द फौज के अधिकारियों पर जब दिल्ली में मुक़दमा चल रहा था, उसी दौरान 22 मई 1946 की सुबह आज़ाद हिन्द फौज के करीब 60 अफसर और सैनिक नई दिल्ली में महात्मा गांधी से मिले। इनमें आज़ाद हिन्द फौज के अस्थायी सरकार और इंडिया इंडिपेंडेंस लीग के सदस्य भी शामिल थे। कर्नल हबीबुर्रहमान ने, जो सुभाषचंद्र बोस के आख़िरी वक़्त में उनके साथ थे, नेताजी के अंतिम क्षणों का वर्णन किया। नेताजी का हाल बताते हुए उनकी आँखों में आँसू भर आए। महात्मा गांधी ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा कि ‘आप तो सच्चे सिपाही हैं। इसलिए आपको इस तरह आँसू नहीं बहाने चाहिए।’
नेताजी और आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों की बहादुरी की प्रशंसा करते हुए गांधी ने कहा कि ‘आपने जो साहस दिखाया है, उससे मैं अत्यंत प्रभावित हूँ। लड़ाई के मैदान में आपने दिखा दिया है कि आप किस धातु के बने हुए हैं।’ साथ ही, उन्होंने कहा कि आज भले नेताजी हमारे बीच नहीं हैं, ‘लेकिन अपने संदेश और दुनिया के समक्ष रखे आदर्शों के रूप में वे हमारे बीच आज भी विद्यमान हैं।’
महात्मा गांधी ने आज़ाद हिन्द फौज को सेना के लोगों में भी एक नई राजनीतिक जागरूकता पैदा करने का श्रेय दिया और आज़ाद हिन्द फौज के धार्मिक सद्भाव और सौहार्द्र की तारीफ करते हुए कहा कि ‘आपने अपने दल के हिंदुओं, मुसलमानों, पारसियों, ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों और सिखों के बीच जो पूर्ण एकता स्थापित की वह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है।’ पर उन्होंने यह भी याद दिलाया कि आज़ाद हिन्द फौज ने ‘भारत के बाहर स्वतन्त्रता के वातावरण में जो-कुछ प्राप्त किया उसे अब भारतीय वातावरण में भी कायम और जीवित रखना है। वही आपकी सच्ची कसौटी होगी।’
सैनिकों से इस बातचीत में महात्मा गांधी ने हृदय की स्वतन्त्रता पर ज़ोर देते हुए कहा कि ‘जिन लोगों के हृदय में स्वतन्त्रता की भावना जाग गई हो उन्हें संसार की कोई भी सरकार उनकी इच्छा के विरुद्ध सलाम करने पर मजबूर नहीं कर सकती। अगर वह उन्हें मार डालने की धमकी भी देगी तो वे अपनी गर्दन आगे कर देंगे, लेकिन सिर नहीं झुकाएँगे।’ इसीलिए उन्होंने कहा कि सबसे जरूरी काम है चालीस करोड़ हिंदुस्तानियों के दिलों से भय को दूर भगाना क्योंकि ‘जिस दिन वे भय त्याग देंगे, भारत की बेड़ियाँ टूटकर गिर जाएंगी और वह स्वतंत्र हो जाएगा।’
हथियारों पर टिप्पणी करते हुए गांधी ने कहा : ‘जबतक मनुष्य अपने हाथ में तलवार रखना चाहता है तबतक यही समझना चाहिए कि उसे पूर्ण निर्भयता प्राप्त नहीं हुई है। जब आप अहिंसा-रूपी कृपाण से सज्जित हो जाएंगे तो संसार की कोई शक्ति आपको दबा नहीं पाएगी। वह कृपाण विजेता और पराजित दोनोंको ऊपर उठाती है।’
गांधी ने आज़ाद हिन्द फौज के अफसरों से यह भी कहा कि न तो उन्हें दया की भीख मांगनी चाहिए और न किसी के दान के भरोसे जीना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर वे ‘अपना नमकीनपन खो देने वाले नमक की तरह अपना सारा महत्त्व खो देंगे।’ उन्होंने सैनिकों से अनुरोध किया कि जिस वीरता का परिचय वे अब तक लड़ाई के मैदान में देते आए हैं, उसी वीरता और साहस का परिचय उन्हें अहिंसक तरीकों से देना चाहिए।
सैनिकों से साथ गांधी की इस बातचीत में अहिंसा की उपयोगिता और उसकी प्रासंगिकता, आत्म-रक्षा और बल प्रयोग जैसे प्रश्नों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। इस मुलाक़ात का विवरण ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’, ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ और ‘हरिजन’ में प्रकाशित हुआ था।

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