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शायद इसलिए पत्रकारिता मंटो के शब्दों में रंडी का कोठा है वहां की हनक से बाबू गोपीनाथ की तरह दिल न लगाइए।
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प्रभाष जोशी ने क्या कहा था, सुनिये
चंडीगढ़ में 1991 का वो महीना, जिसके एक दिन एक होटल में जनसत्ता की वर्षगांठ मनाने की रस्म बड़े बेमन से निभाई जा रही थी. प्रभाष जोशी को तो होना ही था. थे भी लेकिन अवसाद से घिरे हुए. कुछ महीने पहले उनके प्रिय मित्र राजेन्द्र माथुर का आकस्मिक निधन और फिर मेंटर रामनाथ गोयनका भरपूर उम्र में गुजर जाना.
लेकिन प्रभाष जी की मलालता का कारण दूसरा था. वो था अखबार के तेवर ढीले करने का दबाव..जो लगभग इन व्यथित शब्दों में व्यक्त हुआ कि गोयनका जी नहीं रहे. राजीव गांधी भी नहीं रहे. तो अब गांधी परिवार को गरियाने का क्या मतलब.
उसके बाद गोयनका के दोनों अखबारों ने क्या रुख अख्तियार किया होगा..यह समझना बहुत मुश्किल नहीं लेकिन प्रभाष जी की लाचारी तो सामने आ ही चुकी थी. उसमें यह भी था कि अब नए मालिक यानी गोयनका जी के नाती को जनसत्ता सिर्फ इसलिए चलाना है क्योंकि जनसत्ता उसके नाना का सपना था. तो किसी तरह वो सपना पूरा किया जाने लगा.
फिर खुद प्रभाष जी कई छुटभैय्ये संपादकों के सिंहासन के तहत भीष्मपितामह की भूमिका में आ कर मृत्युपर्यंत नमकहलाली करते रहे.
इस पूरे वाक़ये को पत्रकारिता की आज के पारी से तुलनात्मक अध्ययन कीजिये तो विशेष तौर पर हिंदी पत्रकारिता पर विधवा विलाप का कोई अर्थ नहीं रह जाता.
सरकारी नौकरी छोड़ कर दिल्ली में नवभारत टाइम्स में गुजरा वो एक साल कई बड़े बड़े संपादकों को ग़दर के बाद के बहादुरशाह ज़फर की भूमिका निभाने का गवाह बना. उनमें रघुवीर सहाय और कन्हैयालाल नंदन भी शामिल थे. जिन्हें ऐसे केबिनों में बिठा दिया गया था, जहां अखबारों की रद्दी रखी जाती थी. सहाय जी तो ज़्यादा अपमान नहीं झेल सके, नंदन जिन तरीकों से संपादक की कुर्सी तक पहुंचे, उस गुण का लंबे समय तक इस्तेमाल किये हाँ संपादक का स्तर इस हद तक गिर गया कि दिनमान के संपादक घनश्याम पंकज बने.
तो दोस्तो पत्रकारिता का पेशा बड़े बड़ों को इतिहास में धकेल देता है. महा कद्दावर धर्मवीर भारती को देखिए न कुर्सी से हटते ही गुजर गए..ऐसे कई महावीरों की यही दशा हुई. इसलिए हर पत्रकार को अपनी सलाह है कि पत्रकारिता मंटो के शब्दों में रंडी का कोठा है वहां की हनक से बाबू गोपीनाथ की तरह दिल न लगाइए.

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