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सन 1947 की सबसे अच्छी बात – भारत देश आज़ाद हुआ. सन 1947 की सबसे बुरी बात – देश का बंटवारा. जब देश का बंटवारा हुआ तो लाखों लोग
विस्थापित हुए. इन विस्थापितों में से एक तबका सिंधीयों का भी था जिन्हें मुंबई के
नज़दीक एक ट्रांजिट मिलट्री कैंप में रखा गया. ये मिलट्री कैंप उल्हास नदी के
किनारे था. हर बड़ी सभ्यता के आस पास नदी ज़रूरी होती है. यहां पर भी एक सभ्यता अपनी
पहली सांसे ले रही थी. ये एक बड़े शहर का जन्म था. अपनी नदी के चलते शहर का नाम रखा
गया – उल्हासनगर.
# उल्हासनगर –
सिंधी परिवार के
वो एक लाख से ज़्यादा लोग जो अपना सब कुछ पाकिस्तान में छोड़ कर चले आए थे, उन लोगों को सब-कुछ शुरू से शुरू करना था.
लेकिन उनके खून में ही व्यापार था. धीरे-धीरे एक ट्रांजिट कैंप, शरणार्थी शिविर के रास्ते होता हुआ एक समृद्ध
शहर बनता चला गया. शहर, जिसे कागज़ों में
उल्हासनगर कहा जाता था लेकिन वहां की सबसे बड़ी कम्यूनिटी उसे प्यार से सिंधुनगर
कहती थी. शहर पूरे भारत में ड्युप्लिकेट सामान का गढ़ बन गया. लोग कहते थे कि ‘मेड इन यूएसए’ में यूएसए का मलतब ‘उल्हासनगर सिंध एसोसिएशन’ है. नॉर्थ इंडिया
में जो दर्ज़ा ‘मेड इन चाइना’
को प्राप्त है, वही दर्ज़ा महाराष्ट्र में उल्हासनगर को. आज भी!
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| फोटो - गूगल |
जहां पैसा होता
है, वहां पावर होती है. और
होते हैं कुछ लोग जो इस पावर को ‘मैनेज’ करते हैं. इस पावर को मैनेज करने वाले कुछ लोग ‘क़ानूनी’ होते हैं, कुछ लोग ‘ग़ैर क़ानूनी’ होते हैं, लेकिन सबसे कम
मात्रा में वो होते हैं जो न पुलिस वाले होते हैं, न गुंडे होते हैं. संख्या में कम ये लोग पावर में सबसे टॉप
में होते हैं.
# ए एन नारायण –
भारत में
खोजी-पत्रकारिता के क्षेत्र में ब्लिट्ज़ अपने आप में मील का पत्थर था. ऐसा
साप्ताहिक अख़बार जो सत्ता को हिला देने की ताकत रखता था.
अगस्त,
1983 की किसी ‘भरी दुपहरी’ में उल्हासनगर में ब्लिट्ज़ के उप-संपादक ए एन नारायण अपने
पड़ोसी रवि शर्मा के साथ विठलवाड़ी स्टेशन पर टहल रहे थे तभी उन्हें पीछे से दो
लोगों ने टोका. इन दो लोगों ने रवि शर्मा से वहां से ‘कट’ लेने को कहा. जब
रवि थोड़ी देर बाद वहां लौटे तो उन्होंने नारायण को खून से लथपथ पाया. नारायण के
शरीर में 25 अलग-अलग जगहों पर चाकू
से वार किया गया था.
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| ब्लिट्ज का प्रकाशन नब्बे के दशक में बंद हो गया. |
नारायण को अपनी
मौत से काफी समय पहले पता चल गया था कि उनके लेखों के उनका जीवन खतरे में था. कुछ
महीनों पहले भी जब वो एक शादी से लौट रहे थे तो उनकी कार की टक्कर एक ट्रक से हुई
थी. इसमें वो बाल-बाल बच निकले थे. उन्हें अज्ञात फोन कॉल्स में ढेरों धमकियां मिल
रही थीं. एक ऐसी ही ‘गंभीर परिणामों
को भुगतने’ की धमकी एक गुंडे के वकील
से भी उन्हें मिली थी.
नारायण की मौत उन
लोगों का बदला था जो ब्लिट्ज़ और ए एन नारायण के लेखों से डरे हुए भी थे और गुस्से
में भी थे. वे लोग, जो उल्हासनगर के
गैंगस्टर थे. उल्हासनगर, जो अब मुंबई का
एक उपनगर था और तस्करों और गिरोहियों का अड्डा बनता जा रहा था.
# गोपाल राजवानी –
17 साल बाद,
24 जनवरी, 2000 को उल्हासनगर के शिवसेना नेता गोपाल राजवानी को चार अज्ञात
हमलावरों ने गोली मार दी. गोपाल राजवानी शुरू में उल्हासनगर में पापड़ बेचता था.
लेकिन जब गोविंद वाचानी नाम के एक गैंगस्टर के संपर्क में आया तो अपराध की दुनिया
में उसका नाम तेज़ी से बढ़ने लगा.
बाद में राजवानी,
पप्पू कलानी के साथ मिल गया और इनकी ‘शॉर्ट टर्म’ दोस्ती के दौरान ही ब्लिट्ज के उप-संपादक ए वी नारायण की
हत्या हुई. दोनों को इस हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया लेकिन सबूतों के अभाव
में उन्हें बरी कर दिया गया.
1985 में राजवानी और
कलानी की अनबन हो गई. ये अनबन वसूली के पैसों के बंटवारे को लेकर थी. बदले की आग
में जलते कलानी ने अप्रैल, 1985 में राजवाणी को
गिरफ्तार करवा दिया. जब पुलिस राजवाणी को रिक्शे में बिठाकर विठलवाड़ी पुलिस
स्टेशन ले जा रही थी तो कलानी के गुंडों ने हमला करने का प्लान बनाया. राजवानी
गंभीर रूप से घायल हो गया था, लेकिन उसकी
ज़िंदगी बच गई.
उसे जे जे
हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया. वहां वो हाजी मस्तान के संपर्क में आया. हाजी
मस्तान ने राजवानी को अपनी शरण में ले लिया और उसे प्रोटेक्शन भी दिया. फिर
राजवानी दुबई गया और दाऊद इब्राहिम से मिला.
मगर वो फिर कभी
उल्हासनगर वापस नहीं आया. पप्पू कलानी के डर के चलते. जब 1992 में कलानी को टाडा के अंडर में गिरफ्तार कर
लिया गया तब जाकर सालों बाद राजवानी की घर (उल्हासनगर) वापसी हुई. पप्पू कलानी को
राजवानी के दाएं हाथ मारुथी जाधव के मर्डर के चलते गिरफ्तार गिया गया था. बाद में
उसपर सात और मर्डर के आरोप तय हुए.
जब पप्पू कलानी
जेल में था उन दिनों में राजवानी की शक्ति बढ़ती चली गई. राजवानी ने 1995 में शिव सेना जॉइन की और 1998 में उसे हिरासत में ले लिया गया.
# सुरेश बहादुरमल
कलानी उर्फ़ ‘पप्पू’ कलानी –
1986 का जून का
महीना. पिछले तीन दिनों से पूरे शहर की दुकानें, ऑफिस, स्कूल बंद पड़े
थे. कारण था – रमाकांत चव्हाण
नाम के एक ऑटो यूनियन लीडर का मर्डर. इस मर्डर ने महाराष्ट्र के मूल निवासियों
(महाराष्ट्रियन) और सिंधियों के बीच टेंशन को बढ़ा दिया था. सिंधियों को इस हत्या
का ज़िम्मेदार मानकर खास तौर पर टारगेट किया जा रहा था. गर्मी, उमस और एक अनहोनी की आशंका उल्हासनगर के लोगों
की बैचेनी को बहुत बढ़ा रही थी. अनहोनी की एक अजीब सी दुर्गन्ध होती है. उनका एक
लिजलिजा सा एहसास होता है.
उस अघोषित
कर्फ्यू सी स्थिति में सुरेश नाम का एक सिंधी, न जाने किस मोटिवेशन किस महत्वाकांक्षा के चलते इतने टेंशन
और इतने डर के माहौल में खुली जीप में महाराष्ट्रियन इलाके में घुस गया. हवा में
तीन-चार राउंड फ़ायर किए, और पक्षियों के
उड़ने और चिल्लाने की आवाज़ों के बीच वापस लौट आया.
ये ‘अमिताभ बच्चन’ का दौर था. आम आदमी उस जैसे ही किसी करैक्टर को ईश्वर की
तरह पूजने को तैयार थे, और जो थोड़े से
महत्वाकांक्षी थे वो उसकी तरह बनना चाहते थे. उल्हासनगर के लोगों को उनका ‘अमिताभ बच्चन’ मिल गया था.
लेकिन उल्हासनगर
का ये हीरो – सुरेश बहादुरमल ‘पप्पू’ कलानी, कोई कुली या कोई अनाथ
नहीं, वहां के अमीर शराब
व्यापारी का लड़का था. उसके चाचा धुनिचंद कांग्रेस में थे. सनद रहे, ये कांग्रेस 1986 की कांग्रेस थी, 2018 की नहीं. सुरेश बहादुरमल कलानी ने अपने चाचा के कहने पर
उल्हासनगर से नगर परिषद का चुनाव लड़ा और बड़ी आसानी से जीत गया. इस जीत के चलते
पप्पू कलानी को कांग्रेस का कैंडिडेट घोषित कर दिया गया. और वो विधानसभा का भी
चुनाव जीता. लेकिन ये 1990 की बात है. बीच
के चार साल भी कम रोचक नहीं हैं.
# बेहरानी वर्सेज़
कलानी –
1986 में कई सालों
बाद कांग्रेस महाराष्ट्र नगर परिषद में मज़बूती से वापस आई थी. पार्टी के वरिष्ठ
नेता गोप बेहरानी को परिषद के अध्यक्ष पद के लिए सबसे योग्य माना गया लेकिन चूंकि
कलानी चुनाव में कांग्रेस का चेहरा थे और उन्हें ही कांग्रेस का अज्ञातवास समाप्त
करने का श्रेय दिया गया था इसलिए एक समझौता हुआ. कलानी पहले 30 महीनों के लिए अध्यक्ष होंगे और शेष अवधि के
लिए बेहरानी होंगे. 30 महीने समाप्त
हुए. कलानी ने सीट छोड़ने से इंकार कर दिया. ये धोखा कलानी और बेहरानी परिवारों के
बीच पारिवारिक झगड़े की नींव की ईंट था.
# चिमन तेजवानी और
गोविंद वचानी –
पिछले कुछ सालों
में उल्हासनगर की आपराधिक दुनिया में टॉप पर दो लोग चढ़ते चले गए थे. चिमन तेजवाणी
और गोविंद वचानी. और इन दोनों के दो अलग-अलग गिरोह बने. दोनों और दोनों ही के
गिरोह एक दूसरे के खून के प्यासे.
तेजवाणी, कलानी फैमिली के लिए काम करता था और वचानी,
बेहरानी फैमिली के लिए. गोपाल राजवानी और
बेहरानी फैमिली की दोस्ती हो गई थी.
यूं एक तरफ कलानी
फैमिली थी और दूसरी तरफ बेहरानी फैमिली. बेहरानी फैमिली के साथ थे – गोविंद वचानी और गोपाल राजवानी.
# गैंग्स ऑफ़
उल्हासनगर –
अनुराग कश्यप की
फ़िल्म की तरह यहां से शुरू हुआ दो परिवारों के बीच का खूनी खेल. जब बेहरानियों को
एहसास हुआ कि उल्हासनगर के कांग्रेस जिला अध्यक्ष धुनिचंद कलानी के चलते शहर में
उनका बोलबाला नहीं हो सकता तो उन्होंने कथित तौर पर अप्रैल, 1989 में धुनिचंद की हत्या कर दी.
मने विधानसभा
चुनावों के ठीक एक साल पहले, कलानी के चाचा की
हत्या कर दी गई. बेहरानियों को इस हत्या का दोषी माना गया. पप्पू कलानी ने अपने
चाचा की हत्या का बदला लेने के लिए कसम खाई. और फिर शुरू हुआ हत्याओं का दौर.
उल्हासनगर में हो रहे एक के बाद एक मर्डर ने सिंधियों के इस शहर को हिलाकर रख
दिया. इस पूरे दौरान 22 लोग मारे गए.
कहा जाता था कि उल्हासनगर में हर मंगलवार एक कत्ल ज़रूर होता था. ‘कम से कम’ एक कत्ल!
1990 के शुरुआती
महीनों में ही गोप बेहरानी मारा गया था. गोपाल राजवानी का बॉडीगार्ड मारुती जाधव
भी मारा गया. लेकिन मरने से पहले उसने पप्पू कलानी को अपनी हत्या का ज़िम्मेदार
माना. उसने अपने प्री-डेथ स्टेटमेंट में कहा था कि किसी और के द्वारा उसकी हत्या
नहीं की गई थी, बल्कि पप्पू
कलानी ने पर्सनली उसे मारा था.
इस सब के चलते
पप्पू कलानी को कांग्रेस से निकाल दिया गया. लेकिन शिकंजा अभी और कसा जाना था.
# शरद पवार और
सुधाकरराव नाइक –
1991 में साफ़ सुथरी
इमेज वाले सुधाकरराव नाइक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने. लेकिन मुंबई दंगों को
सही से कंट्रोल न कर पाने के चलते दो साल से भी कम समय में उन्हें मुख्यमंत्री पद
से हटना पड़ा. उनके बाद फिर वो ही मुख्यमंत्री बने जो उनसे पहले भी मुख्यमंत्री थे.
शरद पवार.
लेकिन अपने दो
साल के कार्यकाल में सुधाकरराव ने पप्पू कलानी को गिरफ्तार करवा दिया. उसपर टाडा
लगाई गई. इस दौरान सुधाकरराव को शरद पवार ने कॉल किया और कहा – पप्पू कलानी से नर्मी बरतो. ऐसा सुधाकरराव ने
खुद अपने एक सार्वजनिक बयान में बताया था. (बाद में पप्पू कलानी ने और फिर पप्पू
कलानी की पत्नी ने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी भी जॉइन की. ये शरद पवार की ही
पार्टी है.)
गिरफ्तारी के बाद
कितनी ही बार उसकी जमानत की अर्ज़ी खारिज़ हुई. मुकदमे चलते रहे – तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़. और फिर वहीं हुआ जिसकी भारत के लोगों को उम्मीद
होती है. दस साल बाद 2002 को पप्पू कलानी
को जमानत पर रिहा कर दिया गया.
रिहाई के बाद
अपने पहले विधानसभा चुनावों से ऐन पहले, प्रचार के दौरान, पप्पू कलानी ने
कहा था कि ‘मुझे घर-घर जाकर प्रचार
करने की ज़रूरत नहीं है. इस निर्वाचन क्षेत्र के लोग मुझे ‘जानते’ हैं, वे मेरे ‘काम’ को जानते हैं’.
# लोकतंत्र –
1995 और 1999 में पप्पू कलानी ने; जिसपर एक दर्ज़न से ज़्यादा मर्डर के इलज़ाम और कई अन्य
आपराधिक मामले थे, जो जेल में था,
जिसपर टाडा लगी हुई थी; उल्हासनगर विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते. 1995 में 55% वोट पाए और 1999 में 65%. अद्भुत!!
पिछले 6 चुनावों में से 4 चुनावों में पप्पू कलानी जीते हैं, एक में उनकी वाइफ ज्योति कलानी ने जीती हैं और केवल एक बार
हारे हैं. साल 2009 में. जब भाजपा
के कुमार उत्तमचंद अलियानी ने उन्हें साढ़े सात हज़ार के लगभग वोटों से हराया था. जब
आप हार गए तो आपने अपनी धाक जमाने के लिए सरकारी अफसरों को मारना पीटना शुरू कर
दिया.
पप्पू कलानी के
एक करीबी ने अंग्रेजी के एक प्रमुख अख़बार मुम्बई मिरर को तब बताया था कि एक आदमी
जो अपने कलानी महल से लोगों पर हुक्म चलाता था, अब लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए बेताब था. वो अपने
अंगरक्षकों के साथ सड़कों में घूमता रहता है. दुकानदारों से दुआ-सलाम करता है.
# और अंत में जेल –
1990 के विधानसभा
चुनाव. वही चुनाव जिसमें कलानी सबसे पहली बार एमएलए बना.
27 फरवरी,
1990. उस दिन पोलिंग चल रही थी.
कलानी के कुछ लोगों को भटेजा बंधुओं ने रंगे हाथों पकड़ लिया.
क्या करते हुए
पकड़ लिया? – फर्ज़ी मतदान करते
हुए. और साथ ही कलानी के बंदों को ऐसा न करने की चेतावनी भी दी.
भटेजा बंधु कौन?
– कलानी के अपोज़िट में लड़ रहे भाजपा उम्मीदवार
शीतलदास हरचंदानी के ओपन सपोर्टस. और बंधु मतलब दो भाई – घनश्याम भटेजा और इंदर भटेजा.
फिर क्या हुआ ?
– शाम को घनश्याम को मार डाला गया.
इंदर का क्या हुआ?
– वो बच निकला. उसको पुलिस प्रोटेक्शन दिया गया.
लेकिन दो महीने बाद और पुलिस प्रोटेक्शन के बावज़ूद 27 अप्रैल, 1990 को उसका भी मर्डर हो गया.
29 नवंबर को कलानी
और तीन अन्य को इस मामले में दोषी पाया गया. (वो क्या है मुहावर – जस्टिस डिलेड मीन्स जस्टिस डिनाईड). दिसंबर,
2013 में सेशन कोर्ट ने कलानी
को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई.
कलानी को मर्डर
का दोषी नहीं पाया गया. केवल मर्डर करने के षड्यंत्र करने का दोषी पाया गया. अस्तु
– आजीवन कारावास.







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