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By - राहुल कोटियाल
प्यारे पहाड़ी भाईयों,
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| क्रेडिट - बीबीसी |
प्यारे पहाड़ी भाईयों,
कल अगस्त्यमुनि में तुम्हारा रौद्र रूप देखा. एक फर्जी खबर ने तुम्हारा इतना खून खौला दिया कि तुमने अपने ही घरों में तांडव मचा दिया? महिलाओं की 'इज्ज़त' के नाम पर? क्या तुम जानते हो कि असल में उत्तराखंड की महिलाओं के दोषी वही लोग हैं जिनके झंडे उठाकर तुम गर्व से घूम रहे हो....
2 अक्टूबर, 1994 उत्तराखंड के इतिहास का सबसे 'काला दिन' रहा है. मुज़फ्फरनगर के रामपुर तिराहे में इस दिन जो बर्बरता हुई थी, उसे पूरे देश के इतिहास में पुलिसिया बर्बरता की सबसे क्रूर घटनाओं में से एक माना जाता है. न जाने कितनी ही पहाड़ी महिलाओं के साथ इस दिन उत्तर प्रदेश पुलिस के जवानों ने बलात्कार किया था. कई साल इन महिलाओं ने अदालतों के चक्कर काटे, इंसाफ की गुहार लगाई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.
साल 2000 में जब उत्तराखंड राज्य बना तो इन महिलाओं को उम्मीद बंधी कि अब तो इन्हें न्याय मिल ही जाएगा. लेकिन जानते हो ये महिलाएं जब राज्य बनने के बाद मुख्यमंत्री आवास पंहुची तो वहां क्या हुआ? इन महिलाओं पर तंज कसे गए कि, 'देखो. वो आ गई मुज़फ्फरनगर कांड वाली.'
मुज़फ्फरनगर कांड को हुए आज 24 साल बीत चुके हैं. लेकिन इतने सालों बाद भी इसकी एक भी पीड़िता को इंसाफ नहीं मिला है. इससे भी ज्यादा दुखद ये है कि हमारे नेताओं को इसकी जानकारी तक नहीं है कि उन मुकदमों का आखिर क्या हुआ जो इस संबंध में दाखिल हुए थे. ये सारे मुकदमें अब मुज़फ्फरनगर की अदालतों में इतने गहरे दफ़न हो चुके हैं कि न्याय की उम्मीद तक नहीं बची है.
आज से लगभग दो साल पहले मैंने खुद मुज़फ्फरनगर की अदालतों में जाकर इन मुकदमों की फाइलों को खंगाला था. इनमें पहला मुकदमा था 'सीबीआई बनाम मिलाप सिंह' के नाम का. इस मुकदमें की स्थिति ये थी कि 22 साल बीत जाने के बाद भी इसमें सिर्फ दो लोगों की गवाही हुई थी. इस मामले की पीड़िता से जब मैंने बात की तो उन्होंने कहा, 'अब मैं गवाही के लिए भी नहीं जाना चाहती. वहां जाकर सिर्फ बुरी यादें ही ताजा होती हैं. 22 साल में जब कुछ नहीं हुआ तो अब क्या होगा. हमारे नेताओं ने हमें सबसे ज्यादा धोखा दिया है.'
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| क्रेडिट - नेशनल हेराल्ड |
महिलाओं के साथ हुए अत्याचारों का दूसरा मुकदमा था - 'सीबीआई बनाम राधा मोहन द्विवेदी व अन्य.' ये सबसे गंभीर मामला था. 16 आंदोलनकारी महिलाओं के साथ हुए अपराधों के इस मामले में कई महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार और कुछ के साथ तो पुलिस हिरासत में लिए जाने के बाद भी बलात्कार करने के आरोप थे. लेकिन साल 2006 से ही यह मामला पूरी तरह से बंद पड़ा हुआ है और इसकी खबर लेने वाला कोई नहीं है.....
अगस्त्यमुनि में आगजनी करने वाले मेरे भाइयों, तुम्हें अगर पहाड़ की महिलाओं की सच में फ़िक्र है, उनकी अस्मिता पर हुए हमले अगर सच में तुम्हारा खून खौलाते हैं, तो प्रदेश के वर्तमान या पूर्व मुख्यमंत्रियों के गिरेबां पकड़ कर पूछने की हिम्मत करो कि उन्होंने इतने सालों में इन महिलाओं को इंसाफ दिलाने के लिए क्या किया? पहाड़ की जिन महिलाओं ने इस राज्य के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया, उनकी इन नेताओं ने कभी सुध तक नहीं ली. और तुम इन्हीं नेताओं का झंडा उठाकर, फर्जी ख़बरों के आधार पर अपने भाईयों के घर-दुकान जला रहे हो, महिलाओं की रक्षा की बात कर रहे हो?
तुम इस्तेमाल किये जा रहे हो भाईयों. अफवाएं फैलाकर तुम्हें आपस में ही लड़वाया जा रहा है ताकि तुम उनसे सवाल न कर सको जो असल अपराधी हैं. तुम्हें हिन्दू-मुसलमान की बहस में उलझाया जा रहा है और तुम लपक कर इसमें उलझ भी रहे हो. तुम ये भूल रहे हो कि हम उस पहाड़ी संस्कृति के लोग हैं जहां हिन्दू-मुस्लिम एकता की जड़ें बेहद गहरी हैं. हमारे पहाड़ों में 'सैय्यद' की भी जागर गाई जाती है. तुम्हें इस एकता की संस्कृति का प्रतिनिधि होना चाहिए था, लेकिन तुम फेसबुक पर लिख रहे हो कि 'उत्तराखंड अब कश्मीर बन रहा है.'
उत्तराखंड कश्मीर नहीं बन रहा मेरे भाईयों, हमारा पूरा देश ही पकिस्तान बन रहा है. एक हिन्दू पाकिस्तान.......


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