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By - गौरव गुलमोहर
महाराष्ट्र भर के हजारों हजार किसानों के मार्च को देखकर सरकार और मीडिया दंग रह गया। सरकार और मीडिया मजबूर हो गई है। आखिर अब क्या करें।
इन दोनों की स्थिति छछुंदर और सांप की हो गई है। गांव में एक कहानी है कि सांप अगर चूहा समझ चूहे जैसे छछुंदर को मुह में ले लेता है तो वह बहुत बुरे फंस जाता है। अगर छछुंदर को मुह में लेने के बाद सांप उसे उगल देता है तो वह अंधा हो जाता है और निगल लेता है तो मर जाता है।
बिल्कुल यही दशा मीडिया और सरकार की हो गई है। किसान आंदोलन को ये दोनों न नजरअंदाज कर पा रहे हैं न ही बहुत अच्छे से कवर कर पा रहे हैं। सरकार परेशान है आखिर अबतो जो किया किसानों के साथ उसकी पोल पट्टी दुनिया के सामने खुल जाएगी और मीडिया सोच रहा अगर हजारों हजार किसानों को कवर न किया तो चैनल खतरे में पड़ जायेगा। सब ड्रामा खत्म हो जाएगा।
इसलिए दोनों हमसफ़र "मीडिया और सरकार" इसके लिए कोई अलग ही जुगाड़ खोजने में लगे हैं। अंग्रेजी का economic times 35000 से अधिक किसानों को सिर्फ 700 लिख रहा है, TV मीडिया तोड़ मरोड़ कर किसानों की समस्या को दिखा और बता रहा है। किसानों की मूल समस्या को नहीं बता रहा कि आज किसान इस स्थिति में सत्ता के झूठ और फरेब की वजह से पहुंचे हैं। tv मीडिया यह नहीं बता रहा कि सरकार इन किसानों से कितने झूठ बोली है। कितने छल की है। 54000 हजार किसानों की कर्ज माफी की घोषणा कर महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने सिर्फ 2300 (तेईस सौ) किसानों का आधा तीहा कर्ज माफ किया। जब किसान आवाज उठाये तो उन्हें किसी और वादे और इरादे में फंसा दिया। जिसका खामियाजा आज उनके सामने है।
मेनस्ट्रीम मीडिया किसानों के आंदोलन को गुमराह करने और कमजोर करने की भर कोशिश में लगी है। लेकिन अभी उसे वह मौका नहीं मिला है। बाकी मिलेगा भी नहीं। बेचारा मीडिया और सरकार।
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