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By - अमित मंडलोई
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| Credit - The World Reporter |
मौजूदा दौर में हम नेता के बारे में सोचते हैं तो एक अजीब सी आक्टोपस छवि दिमाग में आती है। नेताओं की यह प्रचलित छवि हमारे साथ ही अब पार्टियों के लिए भी सिरदर्द बन गई है। मुझे पिछले कुछ दिनों में यह अहसास हुआ कि राजनीतिक दल भी इन नामुराद नेताओं से आजादी चाहते हैं, जो सारा सत्यानाश करने पर आमादा है। बजबाजते सियासी गलियारों में कोई पतला सा सुराख हुआ है, जिसे न सिर्फ रोशनी बल्कि ताजा हवा की भी दरकार है। दुष्यंत के शब्दों में कहेंं तो वे तालाब का पानी बदलना चाहते हैं, जिनमें फूल कमल के कुम्हलाने लगे हैं। सफलता निश्चित तौर पर बहुत संदिग्ध है, लेकिन उम्मीद की एक छोटी सी किरच भी इस माहौल में एक बड़ा सा सूरज बन सकती है।
कांग्रेस ने छह महीने पहले एक नई विंग बनाई है। ऑल इंडिया प्रोफेशनल कांग्रेस इसका नाम है। कोशिश है कि इसमें प्रोफेशनल्स को शामिल किया जाए। जो नेताओं की हरकतों के कारण सियासत और सियासी दलों दोनों से ही कोसों दूर भागते हैं। वोट देने में भी झिझक महसूस करने लगे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इन जाहिलों के भरोसे देश तो आगे बढऩे से रहा, इसलिए बेहतर है कि हम अपना ही घर-दफ्तर संभालें। अपनी जिंदगी बेहतर बनाएं और किसी तरह बच्चों को विदेश भेजकर सारे झंझटों से मुक्ति पा लें।
इस विंग के मुखिया डॉ. शशि थरूर रविवार को इंदौर में ही थे। उन्होंने खुद स्वीकार किया कि प्रोफेशनल पार्टियों से जुडऩा ही नहीं चाहते। दिनभर अपना काम करते हैं और शाम को डिनर टेबल टीवी देखते हुए देश के पॉलिटिकल सिस्टम को कोसकर रह जाते हैं। प्रोफेशनल कांग्रेस ऐसे लोगों को शामिल करने की कोशिश करेगी। उन्हें अपने एजेंडा बनाने को प्रेरित करेगी, उस पर लगातार चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित करेगी। वक्त आने पर उन्हें कांग्रेस की मुख्यधारा से जोड़ेगी, उसकी गतिविधियों में शामिल करेगी, ताकि यह कुहांसा छंट सके।
डॉ. थरूर ने स्वीकार किया कि पंडित नेहरू और मनमोहनसिंह के अलावा एकाध प्रधानमंत्री को छोडक़र देश में ऐसा कोई नेता नहीं हुआ है, जिसे देश में या देश के बाहर वल्र्ड क्लास एजुकेशन मिला हो। जबकि विदेशों में पूरा दृश्य उल्टा है, वहां पढ़े-लिखे और संभ्रात लोग सियासत की दिशा तय करते हैं। एजेंडा सेट करते हैं, उन पर बात करते हैं, रिसर्च करते हैं, सरकारों से सवाल-जवाब करते हैं। उन पर मॉरल प्रेशर बनाकर रखते हैं।
दुर्भाग्य से हमारे सिस्टम से यह पूरी प्रक्रिया ही नदारद है। सारा मामला एकपक्षीय हो रहा है। नेता मनमाने ढंग से नीतियां बना रहे हैं और पूरा देश उसे मानने के लिए विवश हो रहा है। बदलाव की गुंजाइश इसलिए भी नहीं है क्योंकि उन्होंने जगह इतनी तंग कर ली है कि कोई और चाह कर भी वहां खड़ा ही नहीं हो सकता। वहां वे ही लोग अपना अस्तित्व बना पा रहे हैं जो तिकड़मी हैं, मौकापरस्त हैं या साफ शब्दों में कहें तो आर-पार हैं। धनबल और बाहुबल के दम पर लोकतंत्र को चाहे जैसा हांक रहे हैं।
उधर, भाजपा ने भी पिछले कुछ समय में ऐसे कई प्रयोग किए हैं। अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से कलाकारों, बुद्धिजीवियों को जोडऩे के प्रयास किए हैं। इनके लिए कई तरह के कार्यक्रम भी आयोजित किए गए हैं, ताकि किसी भी तरह संभ्रात और अच्छी सोच-विचार के लोग राजनीति को अछूत न समझे। उसके करीब आए और बदलाव का माध्यम बन सकें। जब तक ताजा हवा नहीं आएगी, अंदर समाई बदबू को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जा सकेगा।
हालांकि समझता हूं कि यह कहना और विंग बना लेना जितना आसान है, ढर्रे को बदलना उतना ही मुश्किल। पारंपरिक नेता इतने धरतीपकड़ हैं कि आसानी से जमीन छोडऩे वाले नहीं है। सोच के दरीचे खोलने को तैयार नहीं होंगे। पहले मैं, फिर मेरा बेटा, फिर उसका बेटा...। इस सोच को बदलने में जमाना लग जाएगा। वैसे भी देश में गुंडों और दंगों के दम पर जनमत को हांक लेना आसान है, बजाय किसी सकारात्मक मुद्दे पर उन्हें एकमत करने के।
इसलिए नेता हिंदू-मुस्लिम, दलित-सर्वण, शहरी-देहाती, अगड़े-पिछड़े के नाम पर लोगों को बांटकर अपनी रोटी सेंक लेते हैं। उन्हें पता है कि हांडी भले ही काठ की है, लेकिन लोकतंत्र के ठंडे चूल्हे पर हर बार यही चढ़ती है। सिर्फ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य की बात करेंगे तो हजार सवाल पूछे जाएंगे, किस-किस का और कहां से जवाब देंगे।
इसलिए खुशी है कि उम्मीद बहुत थोड़ी है, फिर भी सियासी दलों ने जो छोटा सा सुराख बनाया है, वह सुराख किसी रोज पूरा आसमान हो जाए। बस यही दुआ है।
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