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By - आदित्य कमल
आपकी है नज़र , मेरी ज़ेब पर पक्का ज़नाब
लीजिए, ले जाइए ; ये आख़िरी सिक्का ज़नाब !
आपका,मेरा बजट अब एक कैसे हो भला
आपकी है लूट , मेरे वास्ते फक्का ज़नाब !
घेर करके टैक्स में , फिर सेस ऊपर से लगा
आपने छोड़ा कहाँ है - एक भी टक्का ज़नाब !
क्या समझते हैं कि गाड़ी चल रही है ठीक-ठाक
ग़लतफहमी है , यहाँ तो जाम है चक्का ज़नाब !
कितनी रातें फाकों में हमने गुजारीं हैं यहाँ
वर्षों से खाते रहे हैं हम फ़क़त धक्का ज़नाब !
पैंतरों से और कितना,कितनों को बहलाएँगे
दिख रहे हैं आप भी, हम्माम में ' छक्का ' ज़नाब !
आंकड़ों के सारे शातिर खेल खुलते जा रहे
हम नहीं,जितना समझते हैं हमें बोक्का ज़नाब !
ना , अनाड़ी समझने की भूल करिएगा नहीं
दाँव मेरे , आपको कर देंगे भौंचक्का ज़नाब !
आदित्य जी ने यह कविता अपनी फेसबुक वॉल पर पोस्ट थी।
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| Credit - tvkinoradio.ru |
आपकी है नज़र , मेरी ज़ेब पर पक्का ज़नाब
लीजिए, ले जाइए ; ये आख़िरी सिक्का ज़नाब !
आपका,मेरा बजट अब एक कैसे हो भला
आपकी है लूट , मेरे वास्ते फक्का ज़नाब !
घेर करके टैक्स में , फिर सेस ऊपर से लगा
आपने छोड़ा कहाँ है - एक भी टक्का ज़नाब !
क्या समझते हैं कि गाड़ी चल रही है ठीक-ठाक
ग़लतफहमी है , यहाँ तो जाम है चक्का ज़नाब !
कितनी रातें फाकों में हमने गुजारीं हैं यहाँ
वर्षों से खाते रहे हैं हम फ़क़त धक्का ज़नाब !
पैंतरों से और कितना,कितनों को बहलाएँगे
दिख रहे हैं आप भी, हम्माम में ' छक्का ' ज़नाब !
आंकड़ों के सारे शातिर खेल खुलते जा रहे
हम नहीं,जितना समझते हैं हमें बोक्का ज़नाब !
ना , अनाड़ी समझने की भूल करिएगा नहीं
दाँव मेरे , आपको कर देंगे भौंचक्का ज़नाब !
आदित्य जी ने यह कविता अपनी फेसबुक वॉल पर पोस्ट थी।

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