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बेटे भी घर छोड़ जाते है
कमाने की जद्दोजहद में घर से दूर जाते हैं
माँ,बाप,बहन,छोड़ कोहिनूर जाते है
बेटी की बिदाई बहुत देखी होगी तुमने
देख लो बेटे भी घर से दूर जाते हैं
उनका जो दर्द वो बयाँ होने नहीं देते
खुद घुटते है,घर मे कभी रोने नहीं देते
माँ बाप कभी फ़ोन पे हालात पूछते
तब शोक दिल में दबाकर वो मुस्कुराते हैं
देख लो बेटे भी घर छोड़ जाते है
अनजानी सड़क पे वो खोए से घूमते
सोने के लिए जब भी वो आँखों को मूंदते
वो दोस्त वो लड़कपन से जो थे याद आते हैं
देख लो बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
थक कर के जब गिरते थे बिस्तर के कोने पर
घर पे थे तो माँ तेल लेके दौड़ आती थी
छोटी बड़ी बहनों से रिश्ता दोस्ती का था
भाई का दर्द देख वो भी दौड़ जाती थी
अब दुख की मदिरापान का दो घूँट लगाकर
यादों की वो चादर को झट से ओढ़ जाते हैं
देख लो बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
घर की रसोई से हमेशा दूर भागते
लाख पड़े डाँट अपने मन से जागते
भूख मिटाने के लिए खुद बनाते हैं
कभी खट्टा कभी मीठा अधपकक्का पकाते हैं
जब जब सड़क पे जाम लगे भीड़ होती है
ऑफीस से रूम पे जाने में जब देर होती है
ऑटो का मोह त्याग के सिक्का उछालते
चल जाते है पैदल वो कदमें सम्हालते
थक हारकर कभी-कभी वो भूखे सो जाते हैं
देख लो बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
माँ बाप यार दोस्त सबको छोड़ जाते हैं
लड़के भी तन्हाई मे आसू बहाते है
देख लो बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
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| By - सीमांत कश्यप ( घुम्मकड़ लेखक ) |
Comments


Bohut hi khub likha hai.... I am missing my brother ��
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