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ख़ुद के इस अंदाज़ से परेशान हूँ,
अंधेरों से नही चिराग से परेशान हूँ,
खामोशी से नहीं हर आवाज़ से परेशान हूँ,
मैं हर अक्लमंद इंसान से परेशान हूँ..!
नारों से नहीं बवाल से परेशान हूँ,
ख़ामख़ा होने वाली हड़ताल से परेशान हूँ,
लोगों के बदले मिजाज़ से परेशान हूँ,
बदलती हवा से नहीं तबाही के तूफ़ान से परेशान हूँ..!
मैं 'ख़ास' से नहीं हर 'आम' से परेशान हूँ,
शासक से नहीं आवाम से परेशान हूँ,
बेवजह उड़ती इस अफ़वाह से परेशान हूँ,
मरते किसानों के दुर्भाग्य से परेशान हूँ...!
मैं क़ातिल से नहीं हर नादान से परेशान हूँ,
बन्द होती हरेक आँख से परेशान हूँ,
गर्म भट्ठी में जलती 'उस आग' से परेशान हूँ,
मैं सिसकती अस्मिता की उस राख से परेशान हूँ..!
''मैं ख़ुद के इस अंदाज़ से परेशान हूँ''.......!
By - Gayatri Yadav

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